Adhyayan

Monday, 17 October 2022

साया

"तनु " तेरी आँखों में देखती हूँ ख्वाब इस कदर कि, हकीकत की दुनिया अनजानी सी लगती है! 
न आने की आहट न जाने की टोह मिलती है कब आते हो कब जाते हो !
आम का पेड़ हवा में हिलता है तो पत्थरों की दीवार पे परछाई का छीटा पड़ता है और जज़्ब हो जाता है, जैसे सूखी मिटटी पर कोई पानी का कतरा फेंक गया हो !धीरे धीरे आँगन में फिर धूप सिसकती रहती है कब आते हो, कब जाते हो, बंद कमरे में कभी-कभी जब दीये की लौ हिल जाती है तो, तुम्हारा साया मुझको घूँट घूँट पीने लगता है आँखें मुझसे दूर बैठकर मुझको देखती रहती है कब आते हो कब जाते हो "तनु "दिन में कितनी-कितनी बार मुझको - तुम याद आते हो !!!

Sunday, 2 October 2022

मन का डर

क्यों तुझे  डर है कि तू पिघल कर न बन जाए कोई शिला

जाते जाते तुम स्त्री का स्त्रीत्व विचित्र रूप से क्यूँ ले जाते हो,
वो बनना संवारना चाहती है तो उसे अज़ीब लगता है!

तुम चाहे दुनिया से चले जाओ या यूँ ही आगे बढ़ जाओ, स्त्री को एक ठहराव दे जाते हो!

मजबूत हो जाती है वो!
उसका फोन आया , कल जाना है न..
क्या पहना जाए, मेरे पास तो कुछ रहता भी नहीं है न, आप जानते ही हो!

स्वयं जूझते हुए आगे बढ़ गयी तो क्या यहाँ तो हजारों लड़कियां अपनी अंदर की लड़ाई लड़ रही हैं।

कहा कि साड़ी पहन लो या अच्छा सा लॉंग कुर्ता, जीन और कुछ फंकी ज्वैलरी ।

कहते ही वह आश्चर्य मिश्रित रूप से ऊहापोह की स्थिति में आ गयी वो।

क्यों... क्या सजना संवरना नहीं चाहती है वो.?
उसकी आशाएं जिंदा है अभी। 

चाहती है, पर उसने जिसे आधार मान लिया था वो बीच रास्ते में उसका हाथ छुड़ा कर सदा के लिए उसे अकेला करके चला गया।

जूझना पड़ा उसे हालातों से, अपनी भावनाओं से अब बमुश्किल होश आया है उसे तो पहला शब्द था कि हाँ आगे बढ़ना चाहती है वो।

अब मन बनाया है लेकिन अब उसे, उसके जैसा कोई नहीं चाहिये जिससे वो सबसे ज्यादा प्रभावित थी, दिलोजां से चाहती थी।

सोच रही हूँ कि कैसा प्यार था कि जिसके बिना रह नहीं सकती अब भी यादों में है उसी के जैसा कोई भी नहीं चाहिए।
सिर्फ़ आदत हो गई थी उस घुटन में रहने की। 
अंदर तक प्रेम के बहाने उसी प्रेमी के द्वारा उसके कुचले, दबे अहसासों से अब तक डरी हुई है वो ,
हाँ, समझ में आती है उसकी बात।

और अपने से, अपनों से, परायों से लड़ते- लड़ते, लिहाज़ करते, समाज की मर्यादा निभाने की कोशिश उसे मर्दाना ही तो बना दिया इन परिस्थितियों ने।

लड़ रही है वो।
कोशिश मत कर, बस हो जाने दे जो हो रहा है।
बह जा हवा के साथ।

कष्ट अवश्यंभावी है, पर पीड़ित होना स्वेच्छा पर निर्भर है।
तेरा स्त्रीत्व ही तेरा अस्तित्व है।                             
                 "तनु " 3/9/2019

Thursday, 29 September 2022

घुमक्कड़ी

मेरी मनोवृति घुमक्कड़ है।

सौंदर्यबोध की दृष्टि से उल्लास भावना से प्रेरित होकर यात्रा करते हुए मुक्त भाव से यात्राओं को अभिव्यक्ति करने में जो आनंद मिलता है वो किसी और बात में नहीं।
और कुछ मित्र ऐसे मिले हैं कि अपनी इस प्रवृत्ति में इजाफा ही हुआ है।
घुमक्कड़ी के वजीफे मिलते रहे। 

मेरी स्वयं की प्रकृति सौंदर्य प्रेमी है।।
मेरा मन साहित्य की भांति घुमक्कड़ स्वभाव का है जो स्वयं की खोज में निरंतर वृद्धि करता है।

सदैव सुखद अहसास होता है कि हम जहां भी जाते हैं वहां से कुछ-न-कुछ ग्रहण करने को मिलता है।

मेरे द्वारा ग्रहण किये गये प्रेम , सौंदर्य , भाषा , स्मृति हैं जिनको शुद्ध मनोभाव से प्रकट करने की कोशिश कर पाती हूँ।

घूमते हुए हम देश काल परिस्थितियों को तटस्थ भावों से देखते हैं और अपने मनोभावों को लिख पाते हैं ।।

यात्राओं में लोगों से जुड़ने का मौका मिलता है।
हजारों किस्से कहानियों का जन्म होता है, लोग , उनका परिवेश, बोली, भाषा, संस्कृति, वहां का इतिहास और परंपरागत धरोहरों की छवियांँ मन मस्तिष्क में अंकित होता जाती हैं।

और उन ढेरों किस्सों से बनी मैं।
कभी अपनी सी और कभी तो खुद के लिए भी अजनबी।

घूमते हुए जंगलों, पहाड़ों और नदियों से साक्षात्कार करते हुए महसूस होता है कि इंसान इनके बिना कितना निरिह है।
नदियों के किनारे की सभ्यता हमें हमारे होने का प्रमाण देते हैं। 
प्रकृति के दिए अनमोल उपहार के सामने क्या है ?
वादियों, बुग्यालों और उन्नत पहाड़ों पर जीवटता के अहसासों से भर जाते हैं।

जिसने एक बार घुमक्कड़ धर्म अपना लिया, उसे पेंशन कहां, उसे विश्राम कहां ?
आखिर में हडि्डयां कटते ही बिखर जाएंगी।”

खुद के लिए अन्तरात्मा से आवाज़ आती है कि मेरा जीवन, आजीवन यायावर रहे।।।

जन्मों जन्मांतर तक 🌳🥰 #incredibleindia
#uttarakhand #mountains #travel #hiking #adventure #uttarakhandheaven

Tuesday, 6 September 2022

रेत

#oldies2003

साँझ-सवेरे फिरते हैं हम जाने किस वीराने में 
सावन जैसी धूप लिखी है क़िस्मत के हर ख़ाने में _____________________________________

रेत की कागज पर लेटी हुई ऊँगलियाँ 
सहसा उसे देख कर, 
सोचती नमकीन शब्द! 
निशा भी निस्तब्ध... 
कुछ गुरेज कर /
करती अधेड़ सी पहल, 
वह छठी इंद्रिय समझती /
मार के अदृश्य कंम्पनों को, जागृत तरंगों को 
जगी ऊँगलियाँ, अब लिख रहीं कुछ यादें
मुलायम रेत की नम जमी पर...

                    "तनु "

Tuesday, 30 August 2022

रूह

#कभी_कभी 

तुम आते हो ना यहाँ कभी कभी, कभी कभार मेरी याद तुम्हें इस बियाबान में घूमने के लिए मजबूर करती है। 
अब बहुत देर हो गई है, बैठे रहना चाहती थी तुम्हारे साथ घंटों चुपचाप खुले आसमान के नीचे , तुम्हारे बालों में उंगलिया फेरने का जी चाहता था !
कुछ मेरी ही सीमा रेखा ने बांध दिया है मुझको!
माना कि किसी को उत्तर नहीं देना है मुझे!
पर आँखों को तो जवाब देना है। 
ख़ुद को आईने में न देख पाऊँ... 
अपनी आंखों से बहुत डर लगता है मुझे।
ताउम्र नकली चश्मा नहीं लगा सकती हूँ न।
इस हलके-हलके बढ़ती जा रही उम्र को भी तो उत्तर देना होता है न।
      ढलती उम्र की एक आखिरी शाम को खुद से सवाल होगा न।
कि क्या खोया और क्या पाया ?
तब अपने शरीर से बाहर निकलती आत्मा झाँक कर देखगी मेरे खुद के अंदर।
तो पाएगी कि जमीर जिंदा था और तुम्हें भी आराम मिलेगा दमकते दामन को देखते हुए। 
और तब सुकून भर उठेगी रूह मेरी "तनु"... 
और मेरे साथ तुम्हारी भी पाकीजा रूह को करार मिल जाएगा।

Saturday, 27 August 2022

किसे पूछूं, कहाँ हो तुम

यू तो हर रोज सर्दी /गर्मियों की तरह आती जाती तुम्हारी यादें 
ये तो यादें हैं जो मेरे अख्तियार में है कि आती है! काश तुम भी होते।।। 
दर्द हो तो /खुशी हो तो /
तुम भी मेरे अख्तियार में होते तो बाँध ही लेती तुम्हें भी/
ताबीज बना के पहन लेती। 
क्या क्या जतन करे मैंने कि तुम मेरे रहो /पीर/फकीर, गंडे-ताबीज, खुदा-भगवान।  
कहते हैं कि रूक जाते हैं जाने वाले,
पर तुम तो रोकने वाले के ही बुलावे पर थे। 
सोने की कोशिश करती हूं कि मेरे ख्वाबों में आती तुम्हारी तस्वीर, हल्की खुली आँखों से तुम्हें महसूस करती हूं फिर कस के आँखे बंद करती हूँ कि गुम ना हो जाओ कहीं। 
क्या सच में कभी तुम्हें देख पाऊँगी, वहम भी क्या है कि तुम आज भी मेरी रूह में समाये हो। महसूस होते हो, साथ में।।। 
लोग कहते हैं कि ना याद करो जाने वाले को, कोई बताओ कैसे समझा सकते हो/ 
खुदा मेरे, तेरा दिया दर्द शिद्दत से संभाले हूँ मैं। 
जीते जी भी तो लोग जाते हैं, एक उम्मीद छोड़ कर,कि फिर मिलेंगे कभी। 
दूर से लोगों को तकती हूँ, कि तुम होते तो शायद ऐसे होते, तुम ये करते, तुम वो करते। 
पर तुम..... 
बस तुम और तुम। 
तुम्हें पता है कि किस कदर दर्द के अंधेरों में घुट गई है सांसे ये
क्या तुम मिलोगे कभी ?

Tuesday, 9 August 2022

#दोस्ती



1993 जून में बीकानेर की तपती दोपहरी की बात थी,
दरवाजे पर दस्तक हुई मैं नींद में अलसाई सी उठी।

दरवाजा खोलने पर गरम हवा का जबरदस्त थपेड़ा पडा़ और तपते सूरज की किरणों से आँखें चुँधिया गयी।

सामने बांधनी के रंगीन सूट में एक लड़की थी।
मैंने कहा - हाँ जी...
वो मुझे देखते हुए बोली, आपके बगल के कमरे में आँटी जी रहती है वो हैं क्या?

आप उनका दरवाजा खटखटाईये...

हाँ, मैंने किया पर कोई असर नहीं।

अच्छा मैं अंदर से देखती हूँ।
हमारा वरांन्डा एक ही था।
ऊपर से छत भी खुली हुई थी ताकि रोशनी और हवा का अच्छा आवाजाही हो।

मैं अंदर उनके सारे कमरे घूम कर आ गयी शायद वो लोग घर में नहीं हैं।

आकर उसको बोला, कोई नहीं है घर में।
बाद में देखना।

वो बोली अच्छा, अब कल आऊँगी, मैं उनसे सिलाई सीखने आई थी हमें कालेज का एक प्रोजेक्ट बनाना है उसके लिए चाहिए।

अच्छा...फिर अब ?

कल आऊँगी कहते हुए वो आगे बढ़ गयी। 
ठीक है कहते हुए मैंने भी दरवाजा ढाँप दिया और एक कुर्सी पर बैठी।
नींद से जगा दिया इसने अब क्या करूँ बोर हो जाऊँगी और उफ इतनी गर्मी।
सो गयी थी तो पता नहीं चल पाया।

फिर उसको ही मन में याद किया कि ये इतनी गर्मी में कैसे आ गयी।
बाहर तो निकलने का ही नहीं हो रहा है।
और अचानक याद आया कि अरे हद हो गई मैं उसको अंदर बैठने के लिए कह सकती थी उसको पानी पूछना था।

हालांकि फ्रिज़ नहीं था मटके का पानी तो.... ओ हो।

मैंने झपटते हुए दरवाजा खोला और दौड़ कर बाहर आई कि दिखेगी तो आवाज़ दूँगी और बुला लूँगी।

पर नहीं दिखी और मुझे भी तो वहाँ आए एक हफ्ता ही हुआ है बाहर निकल कर देखा तक नहीं है कि कौन सी गली कहाँ जाती है।
अफसोस हो गया अब तो कुछ भी नहीं किया जा सकता है, यूँ भी घर से पहली बार निकली हूँ पता भी नहीं था कि पूछते भी हैं।
अगले दिन फिर से दस्तक हुई दरवाजा खोला तो सामने फिर एक युवती। हम उम्र

मैंने कहा आप कल भी आई थीं क्या?
वो बोली - हाँ, मंडीवाल आँटी जी से कुछ सामान बनवाना है और कुछ सीखना भी है।

मैंने जल्दी से कहा अच्छा आप अंदर आ जाईये बाहर बहुत गर्मी है, खूब तप रहा है।
वो बोली राजस्थान है जी ये तो होगा ही।
हाँ बात तो सही है आप बैठिए मैं आंटी जी को देखती हूँ।
अंदर देखा तो फिर कोई नहीं था।

आपने उनको बताया था कि आप आने वाली हैं क्योंकि आप कल भी आए थे।

नहीं सुबह कालेज चले जाते हैं और अभी वो मिल नहीं रही हैं हमने उनसे सीखने के लिए बात करनी है।
ओह अच्छा।
अच्छा मैं शाम को कह दूँगी आपका नाम बता दीजिए।
उसने बताया सरोज सहारण नाम है उसका।
लिख दीजिए नाम तो याद रहेगा आपकी कास्ट याद नहीं आएगी।
हमारे उधर नहीं होते हैं न।

वो बोली कहाँ से हो आप।
नैनीताल...
नैनीताल? 
वो जो पिक्चर में आता है अरे बड़ी सुन्दर जगह है वो तो।

अपना मन तो फूल कर कुप्पा हो गया।
हाँ बहुत खूबसूरत है।

वैसे राजस्थान भी बहुत सुंदर है।
अभी देखा नहीं है सब काम वगैरह सैट हो जाए तो देखने जाऊँगी।
वो बोली चलना मेरे साथ बहुत दोस्त हैं और घर आना माँ पिताजी से मुलाकात होगी और दो भाई बहन हैं।
सिर्फ दोस्त ही नहीं मिली पूरा परिवार मिल गया। 
फिर पानी कुछ देर बाद रूह आफजा शर्बत आदि के साथ बातें होते होते अटूट रिश्ता बन गया।

जिंदगी के अहम् फैसला तुझसे पूछा और तू फिक्र मत करना सब कुछ ठीक चल रहा है। 
आज तक कई कहानियां गढ़ रहे हैं।
तब से अब तक कोई दिखता ही नहीं कि जिससे दिल की बात की जा सके।
जो अन्तर्मन को छू सके।
अब तो लोगों से सिर्फ़ कहा जाता है, बताया जाता है, महसूस कोई नहीं करता !