Adhyayan

Friday, 20 January 2023

पीड़ा

अभी अभी
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सपाट दीवार पर
नक्काशीदार फ्रेम से
माला पहन मुस्कुराकर 
बाहर झाँकते लोग
कभी नहीं बता पाते अपने यूं 
तस्वीर हो जाने का कारण !
वे नहीं बता पाते जीवन से मृत्यु तक के 
सफर की वे सारी दुश्वारियाँ और अड़चनें, 
जो जीवन के दोराहों , चौराहों ,पगडंडियों ,
लाल बत्तियों और स्पीड ब्रेकरों पर उनसे दोचार हुई थी !
वे नहीं बता पाते कि उम्रभर 
पाई-पाई जोड़कर सहेजे संभाले घर से 
अपने अंतिम सफर को निकलते 
उस ऊबड़ खाबड़ काठ की शैया पर लेटे
चुभी थी उनकी पीठ में कोई कील ,
काँधे बदलते लगे थे कितने हिचकोले,
वे नहीं बता पाते अग्नि का वो ताप 
जिसने चंद मिनटों में राख कर 
मिला दिया था उन्हे उनकी बिछड़ी मिट्टी से!
उनकी यह मुस्कुराहट मौन संकेत है इस सत्य का
कि अपनी बिछड़ी मिट्टी से मिलने का 
यह सफर बताने का नहीं 
अपितु मृत्यु को जीकर उसे स्वयं में 
आत्मसात करने का होता है!

Friday, 23 December 2022

प्रतिज्ञा

ऐसी करता हूँ तुमसे प्रीत
जैसे गहरे चीड़ों के बीच सुलझाती है हवा ख़ुद को
चाँद चमकता है रोशनाई की तरह आवारा पानी पर
दिन एक-से भागते हैं एक-दूजे का पीछा कर

बर्फ़ पसर जाती है नाचते चित्रों जैसे
पश्चिम से फिसल आते हैं समुद्री पंछी
कभी-कभी एक जहाज़ । ऊँचे-ऊँचे तारे ।
एक स्याही को पार करता जहाज़
आह ! अकेला ।

अकसर मैं उठ जाता हूँ पौ फटते ही और मेरी आत्मा गीली होती है
दूर सागर ध्वनित-प्रतिध्वनित होता है
अपने बंदरगाह पर ।

ऐसी करता हूँ तुमसे प्रीत
ऐसी करता हूँ प्रीत और क्षितिज छिपा लेता है तुम्हें शून्य में
इन सब सर्द चीज़ों में रहते करता हूँ तुमसे अब भी प्रेम
अकसर मेरे चुम्बन उन भारी पोतों पर लद जाते हैं
जो समुद्र को पार करने चल पड़े हैं, बिना आगमन की संभावना के
और मैं पुराने लंगर-सा विस्मृत पड़ा रहता हूँ

घाट हो जाते हैं उदास जब दोपहर बँध जाती है आकर
मेरा क्षुधातुर जीवन निरुद्देश्य क्लांत है
मैंने प्यार किया, जिसे कभी पाया नहीं ।
तुम बहुत दूर हो
मेरी जुगुप्सा लड़ती है मंथर संध्या से
और निशा आती है गाते हुए मेरे लिए

चाँद यंत्रवत अपना स्वप्न पलटता है
और तुम्हारी आँखों से सबसे बड़ा सितारा टकटकी लगाए देखता है मुझे
और क्योंकि मैं करता हूँ तुमसे प्रीत
हवाओं में चीड़ तुम्हारा नाम गुनगुनाते हैं
अपने पत्तों की तंत्री छेड़ते ।

पाब्लो नेरुदा

अनुवाद

Thursday, 8 December 2022

त्याग /आनन्द

उत्सव मेरे जीवन जीने के ढंग की बुनियाद है--त्याग नहीं, आनंद। 
आनंद सभी सुंदरताओं में, सभी उल्लास में, वो सब जो कुछ जीवन लाता है, क्योंकि यह सारा जीवन परमात्मा का उपहार है। 
मेरे लिए जीवन और परमात्मा पर्यायवाची है।

सच तो यह है कि जीवन ‘परमात्मा’ से अधिक अच्छा शब्द है। 
परमात्मा दार्शनिक शब्द है जबकि जीवन वास्तविक है, अस्तित्वगत है। 
‘परमात्मा’ शब्द सिर्फ शास्त्रों में होता है। यह मात्र शब्द है, निरा शब्द है। 
जीवन तुम्हारे भीतर है और बाहर है--वृक्षों में, बादलों में, तारों में। 
यह सारा अस्तित्व जीवन का नृत्य है । 

जीवन को प्रेम करो।

अपने जीवन को संपूर्णता से जिओ, जीवन के द्वारा दिव्य से मदमस्त हो जाओ।

मैं जीवन के बहुत गहन प्रेम में हूं, इसी कारण मैं उत्सव सिखाती हूं।
हर चीज का उत्सव मनाया जाना चाहिए; हर चीज को जिया जाना चाहिए, 
प्रेम किया जाना चाहिए।

मेरे लिए कुछ भी लौकिक नहीं है और कुछ भी पारलौकिक नहीं है।
सब कुछ पारलौकिक है, सीढ़ी की सबसे निचली पायदान से सबसे ऊपर की पायदान तक। 
यह एक ही सीढ़ी है : 
शरीर से लेकर आत्मा तक, शारीरिक से आध्यात्मिक तक, सब कुछ दिव्य है।  "तनु"

Saturday, 26 November 2022

एप्लीकेशन

कुछ कड़वा भूलने के लिए कुछ यादों को ताजा करना जरूरी है।।।
कुछ बचपन की बातें याद करना सही है।
हालांकि, हल्की सी हँसी आ गयी जिससे मैं खुद भी घबरा जा रही हूँ।

संस्मरण

कालेज में हमारा एक सब्जेक्ट का पीरियड साढ़े तीन बजे होता था और बाकी सभी क्लासेज दिन में साढ़े बारह से एक बजे तक निपट जाते थे।

खाली समय हमें यूँ ही दाएँ बाएं बैठकर गुजारने होते थे।

मेरे लिए दिन के वो दो ढाई घंटे बहुत अझेल हो जाते थे।
क्योंकि तब भी ज़्यादा लोगों से पहचान बढ़ाने की आदत नहीं थी और लगता था कि घर चल दो।
घर में डैडी जी के बिजनेस रिलेटेड कई किस्म के रजिस्टर मेंटेन करने होते थे तो लगता है कि बेकार कालेज में देर हो रही है और काम पूरा नहीं होगा तो डैडी की डाँट पड़ेगी।

एडमिशन के एक डेढ़ महीने बाद जब हम सभी मित्र बैठे हुए थे तो मैंने कहा कि यार इतनी देर फिजूल में बैठना मुश्किल हो जाता है।
इसी में लड़के लडकियों ने हाँ हाँ कहा और इसी बात को सभी ने अपने-अपने वर्जन में रिपिट किया और घर की कुछ न कुछ मज़बूरी भी बताई जैसा कि अमूमन होता है।
एक बार को बार बार कहना।

खैर...
मैंने कहा कि क्या ये बदला नहीं जा सकता है?

अच्छा सुनो एक एप्लीकेशन लिखते हैं और प्रिसिंपल सर को दे देते हैं।
फिर विचार विमर्श किया कि एक एप्लीकेशन लिखी जाए और सभी छात्र जो सहमत हैं इस पर साईन कर देते हैं और प्रिसिंपल सर को देकर आते हैं।

फिर आई बारी लिखने की, सभी ने कहा तुम लिखो राउटिंग सही आएगी।

मैंने भी मन ही मन सोचा कि हाँ बचपन में तुमने मेरे डैडी जी और Kusum Bisht Ma'am के हाथों मार खाई होती तो तुम्हारी भी राइटिंग सही होती।
एक ही शब्द कई कई बार लिखाए जाते थे!

फिर एक रजिस्टर के बीच के पेज पर समय बदलाव के लिए एप्लीकेशन लिखी।
ताकि सभी के साईन कराये जा सके।

तीस चालीस छात्र छात्राओं के साईन के बाद भी कुछ छात्र बच गये थे कि अचानक आखिरी क्लास की घंटी बजी और हम क्लास में जाने के लिए चल पड़े।

फिर मेरे साथियों ने कहा कि जो जिन छात्रों के साईन नहीं हुए हैं वो क्लास में आ रहे हैं और तू उनसे साईन करा ले।

ओह हाँ, सही कहा ।
क्लास में पहुंच कर इधर उधर देख कर मैंने पर्चा निकाला और सामने पहचान के एक स्मार्ट से लड़के की ओर ये सोचते हुए बढ़ा दिया कि ये तो कालेज इलैक्शन की तैयारी कर रहा था और जीत पक्की थी, लिहाजा बाकी लड़कों से ही साईन करा लेगा।

हालांकि सब बारहवीं पास करके आए थे लेकिन पहचान न होने से कुछ अटपटा ही लगता है।
पहचान बढ़ाने की कोई जरूरत भी महसूस नहीं होती थी।

कागज देखने के बाद उस लड़के ने फटाफट एप्लीकेशन पकड़ी और फोल्ड करके अपनी जेब के हवाले कर दी।

अब मुझे समझ में नहीं आया कि वो साईन क्यों नहीं कर रहा है।
हम दो तीन लड़कियों ने आपस में एक दूसरे की ओर देखा तो सभी क्वैशचन मार्क वाली स्थिति में आ गये।
कि शायद क्लास के बाद साईन करा लेगा।
क्योंकि तभी अचानक हमारे प्रोफेसर साहब आ गये।
अनर्गल बकते हुए बोले अरे छोकरियों नैन मटक्का मत करो।
बाहर क्यों झांक रहे हो पढाई करो।

नोट - (कई पूर्व छात्र-छात्राएं समझ जाएंगे कि कौन से सर ऐसा बोलते थे )

सभी नये बच्चों के लिए उनका इस तरह से बोलना एक किस्म की प्रताड़ना दे जाता था और दो चार उजड्ड लड़के नीचे सिर करके खीं-खीं कर हँसते थे, तब लगता था कि ये पक्का किसी गाँव खेड़े के लड़के होंगे )

बाद में मैंने अपनी फ्रेंड से कहा, अब तू ही कागज मांग, उसने तो जेब में रख लिया!
तू माँग ला मैं प्रिन्सिपल सर को दे आऊंगी!
उसने चटपट बोला, हाँ चल अच्छा है मुझे ऑफिस जाने का मन नहीं था, डर लगता है, मैं इससे applications ले लेती हूँ, वो आसान है !

अब जब क्लास खत्म होने के बाद वो application मांगने गई और उसको कहा कि वो लैटर दे दो, जो अभी तुम्हें तनु ने दिया था!
वो आवक सा रहा और मुझे ढूँढने लगा!
मैं क्लास से निकल कर कॉरिडोर में अपनी दोस्त का इंतजार कर रही थी।
लेकिन बाहर आवाज आ रही थी।
Friend ने दुबारा कहा कि इधर उधर क्या देख रहे हो, जल्दी दो, प्रिन्सिपल सर निकल जाएंगे, कागज उनको देना है!

अब वो सकपका कर दौड़ा।
दौड़ाते हुए उसने कॉरिडोर में मुझे देखा तो मेरे सामने रूक गया, जैसे ही मैंने उसको देखा तो मैंने ये भी देखा कि हमारी सखी भी लगभग दौड़ लगाते हुए उसके पीछे पीछे आ रही है।
मैं लड़के की ओर अनदेखा करते हुए अपनी फ्रेंड से बोली क्या हुआ?

तो वो एकदम से बोला ये वो लैटर माँग रही है जो आपने मुझे दिया।

मैंने कहा - हाँ तो....
दे दो न वो आगे देना है।

क्यों.... वो बोला क्या है वो ?

मैने कहा हद है पढ़ा नहीं अभी तक ?
बाकी का काम तो क्या ही कराया होगा,
आप ऐसे इलैक्शन लड़ेंगे ?
जबकि ये काम आपने करना चाहिए।

वो बोला, मैंने सोचा घर जाकर देखूँगा।

मैं हल्की सी आवाज़ में लगभग चीख ही पड़ी अरे यार....
क्यों अभी साईन कर दो न।
वो प्रिसिंपल को देना है।

वो बोला - साईन क्यों?
प्रिसिंपल... मतलब?

मैं - क्यों का क्या मतलब, क्लास का समय चेंज कराना है या नहीं?

अब उसकी समझ में आया उसने आव देखा न ताव, कागज़ जेब से निकाल कर सरसरी नजर मारी और तेजी से हाथों में लगभग पटक कर चल दिया कि काग़ज़ हाथों से गिर गया ।

अब हम दोनों दोस्तों ने एक-दूसरे की ओर देखा तो समझ में नहीं आया कि....
ये पागल है क्या?

ये क्या बात हुई , ये एप्लीकेशन फेंक कर क्यों चला गया ?

इसको क्लास नहीं बदलनी है क्या?

खैर मैंने एप्लीकेशन उठाई और हम दोनों लोग आफिस की ओर चल पड़े।

वैसे मैं कालेज में सिर्फ एक साल ही पढ़ पाई थी।
बाकी की पढ़ाई बाहर रहते हुए करी।
पता होता तो बैकार में इतनी मेहनत नहीं करती।

बाद में जब हम दोस्तों को उसके काग़ज़ पटकने का कारण समझ आया तो बहुत हँसी भी आई और बहुत प्यार भी।

अब उम्र हो चली है न।
कुछ बातें बहुत आसान होती हैं जिन्हें जबरदस्ती काम्पलीकेटेड बना दिया जाता है! 

सभी फ्रेंड्स फ्रेडलिस्ट में है ।।।

Monday, 17 October 2022

साया

"तनु " तेरी आँखों में देखती हूँ ख्वाब इस कदर कि, हकीकत की दुनिया अनजानी सी लगती है! 
न आने की आहट न जाने की टोह मिलती है कब आते हो कब जाते हो !
आम का पेड़ हवा में हिलता है तो पत्थरों की दीवार पे परछाई का छीटा पड़ता है और जज़्ब हो जाता है, जैसे सूखी मिटटी पर कोई पानी का कतरा फेंक गया हो !धीरे धीरे आँगन में फिर धूप सिसकती रहती है कब आते हो, कब जाते हो, बंद कमरे में कभी-कभी जब दीये की लौ हिल जाती है तो, तुम्हारा साया मुझको घूँट घूँट पीने लगता है आँखें मुझसे दूर बैठकर मुझको देखती रहती है कब आते हो कब जाते हो "तनु "दिन में कितनी-कितनी बार मुझको - तुम याद आते हो !!!

Sunday, 2 October 2022

मन का डर

क्यों तुझे  डर है कि तू पिघल कर न बन जाए कोई शिला

जाते जाते तुम स्त्री का स्त्रीत्व विचित्र रूप से क्यूँ ले जाते हो,
वो बनना संवारना चाहती है तो उसे अज़ीब लगता है!

तुम चाहे दुनिया से चले जाओ या यूँ ही आगे बढ़ जाओ, स्त्री को एक ठहराव दे जाते हो!

मजबूत हो जाती है वो!
उसका फोन आया , कल जाना है न..
क्या पहना जाए, मेरे पास तो कुछ रहता भी नहीं है न, आप जानते ही हो!

स्वयं जूझते हुए आगे बढ़ गयी तो क्या यहाँ तो हजारों लड़कियां अपनी अंदर की लड़ाई लड़ रही हैं।

कहा कि साड़ी पहन लो या अच्छा सा लॉंग कुर्ता, जीन और कुछ फंकी ज्वैलरी ।

कहते ही वह आश्चर्य मिश्रित रूप से ऊहापोह की स्थिति में आ गयी वो।

क्यों... क्या सजना संवरना नहीं चाहती है वो.?
उसकी आशाएं जिंदा है अभी। 

चाहती है, पर उसने जिसे आधार मान लिया था वो बीच रास्ते में उसका हाथ छुड़ा कर सदा के लिए उसे अकेला करके चला गया।

जूझना पड़ा उसे हालातों से, अपनी भावनाओं से अब बमुश्किल होश आया है उसे तो पहला शब्द था कि हाँ आगे बढ़ना चाहती है वो।

अब मन बनाया है लेकिन अब उसे, उसके जैसा कोई नहीं चाहिये जिससे वो सबसे ज्यादा प्रभावित थी, दिलोजां से चाहती थी।

सोच रही हूँ कि कैसा प्यार था कि जिसके बिना रह नहीं सकती अब भी यादों में है उसी के जैसा कोई भी नहीं चाहिए।
सिर्फ़ आदत हो गई थी उस घुटन में रहने की। 
अंदर तक प्रेम के बहाने उसी प्रेमी के द्वारा उसके कुचले, दबे अहसासों से अब तक डरी हुई है वो ,
हाँ, समझ में आती है उसकी बात।

और अपने से, अपनों से, परायों से लड़ते- लड़ते, लिहाज़ करते, समाज की मर्यादा निभाने की कोशिश उसे मर्दाना ही तो बना दिया इन परिस्थितियों ने।

लड़ रही है वो।
कोशिश मत कर, बस हो जाने दे जो हो रहा है।
बह जा हवा के साथ।

कष्ट अवश्यंभावी है, पर पीड़ित होना स्वेच्छा पर निर्भर है।
तेरा स्त्रीत्व ही तेरा अस्तित्व है।                             
                 "तनु " 3/9/2019

Thursday, 29 September 2022

घुमक्कड़ी

मेरी मनोवृति घुमक्कड़ है।

सौंदर्यबोध की दृष्टि से उल्लास भावना से प्रेरित होकर यात्रा करते हुए मुक्त भाव से यात्राओं को अभिव्यक्ति करने में जो आनंद मिलता है वो किसी और बात में नहीं।
और कुछ मित्र ऐसे मिले हैं कि अपनी इस प्रवृत्ति में इजाफा ही हुआ है।
घुमक्कड़ी के वजीफे मिलते रहे। 

मेरी स्वयं की प्रकृति सौंदर्य प्रेमी है।।
मेरा मन साहित्य की भांति घुमक्कड़ स्वभाव का है जो स्वयं की खोज में निरंतर वृद्धि करता है।

सदैव सुखद अहसास होता है कि हम जहां भी जाते हैं वहां से कुछ-न-कुछ ग्रहण करने को मिलता है।

मेरे द्वारा ग्रहण किये गये प्रेम , सौंदर्य , भाषा , स्मृति हैं जिनको शुद्ध मनोभाव से प्रकट करने की कोशिश कर पाती हूँ।

घूमते हुए हम देश काल परिस्थितियों को तटस्थ भावों से देखते हैं और अपने मनोभावों को लिख पाते हैं ।।

यात्राओं में लोगों से जुड़ने का मौका मिलता है।
हजारों किस्से कहानियों का जन्म होता है, लोग , उनका परिवेश, बोली, भाषा, संस्कृति, वहां का इतिहास और परंपरागत धरोहरों की छवियांँ मन मस्तिष्क में अंकित होता जाती हैं।

और उन ढेरों किस्सों से बनी मैं।
कभी अपनी सी और कभी तो खुद के लिए भी अजनबी।

घूमते हुए जंगलों, पहाड़ों और नदियों से साक्षात्कार करते हुए महसूस होता है कि इंसान इनके बिना कितना निरिह है।
नदियों के किनारे की सभ्यता हमें हमारे होने का प्रमाण देते हैं। 
प्रकृति के दिए अनमोल उपहार के सामने क्या है ?
वादियों, बुग्यालों और उन्नत पहाड़ों पर जीवटता के अहसासों से भर जाते हैं।

जिसने एक बार घुमक्कड़ धर्म अपना लिया, उसे पेंशन कहां, उसे विश्राम कहां ?
आखिर में हडि्डयां कटते ही बिखर जाएंगी।”

खुद के लिए अन्तरात्मा से आवाज़ आती है कि मेरा जीवन, आजीवन यायावर रहे।।।

जन्मों जन्मांतर तक 🌳🥰 #incredibleindia
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