Adhyayan

Monday, 28 February 2022

सफ़र

अपनी मर्जी से कहाँ अपने सफर के हम हैं।
रूख हवाओं का जिधर है उधर के हम हैं

हम दौड़ में अव्वल आयें ये ज़रूरी नहीं,
हम सबको पीछे छोड़ दें ये भी ज़रूरी नहीं।
ज़रूरी है  दौड़ में शामिल होना,
ज़रूरी है हमारा गिर कर फिर से खड़े होना।
ज़िन्दगी में इम्तेहान बहुत होंगे,
आज जो आगे हैं कल तेरे पीछे होंगे।

बस हम चलना मत छोड़ें,
बस हम लड़ना मत छोड़ें !!!

Thursday, 10 February 2022

काल चक्र

"काल चक्र" 

पतझड़ में घास... 
पतझड़ में एक पत्ते से घास ने कहा,
तुम नीचे गिरते हो तो कितना शोर मचाते हो! 
            मेरे शिशिर स्वप्नों को बिखेर देते हो! 
पत्ता क्रोधित होकर बोला, 
                  "बदजात माटी मिली" 
                    बेसुरी, क्षुद्र कहीं की, 
         तू ऊँची हवाओं में नहीं रहती, 
    तू संगीत की ध्वनि को क्या जाने, 
फिर पत्ता, वह पतझड़ का वह पत्ता,
        जमीन पर गिरा और सो गया! 
           जब बसंत आया वह जागा, 
और.. 
तब वह घास की पात था! 
फिर पतझड़ आया और शिशिर की नींद से, 
                       उसकी पलकें भरी हुई थी, 
ऊपर से हवा में से पत्तों की बौछार हो रही थी! 
           वह बुदबुदायी, 
उफ, ये पतझड़ के पत्ते,कितना शोर करते हैं, 
           मेरे शिशिर स्वप्नों को बिखेर देते हैं !!!

Tuesday, 18 January 2022

#वाशिंगमशीन

#वाशिंग_मशीन

नीति ने अपने बेटे के बैग में से कपड़े निकाल कर धोने के लिए सेमीवाशिंग मशीन में डाल दिए!

एक बार और देख लेती हूँ सोचकर वो दो - तीन मिनट में मशीन तक पहुँची तो धक से रह गयी, जल्दी से स्विच ऑफ करके मशीन बंद की!

कुछ नोट ऊपर से ही तैर रहे थे, उसने हाथ से कपड़े उल्ट कर देखे तो बहुत सारे, बीस, सौ, पचास के नोट, फोटो आई डी, गाड़ी का लाइसेंस सब भीगे हुए थे।

उसे समझ में नहीं आया कि ऐसा कैसे हो सकता है ?
वो हतप्रभ सी थी ! 

फिर उसने सावधानी से सब सामान हटाया और बाहर आकर बेटे को आवाज़ देकर कहा, बेटा सुनो।

तुम अभी आए हो और मशीन में तुम्हारा पर्स और इतना सब सामान कहाँ से आया होगा ?

और इतना कहते कहते ही अचानक जैसे उसे कुछ ध्यान आया...

अच्छा, ओह....
अपने माथे पर हाथ लगाया और बोली, अरे ये सब तुम्हारे कपड़ों, जेब में होगा न ये पर्स।

अरे रे, ये क्या कर दिया मैंने!

तब तक बेटा भी वहां पर आकर चुपचाप मुँह को हाथ से ढककर चुपचाप मुस्कुराते हुए उसे देख रहा था....

नीति ने उसकी ओर देखा तो बोली,
 क्या?
ऐसे क्या मुस्कुरा रहे हो, कुछ कहते क्यूँ नहीं, डाँटो मुझे।

सौरभ, नीति का बेटा...
प्यार से उसका हाथ पकड़कर कहता है आओ यहाँ बैठो आप।
अब इसमें डाँटना क्या ।

मैं खुद धो लेता, आपने क्यों किया ? 

उसकी बातों में नीति ने कहा, सुन, सुन।

प्रेस करके सूखा देती हूँ। 
वरना सब कागज और पैसे गल जायेंगे।

सौरभ बोला - नहीं माँ, कोई बात नहीं माँ, सूख जायेंगे, आप टेंशन मत लो, सूख जाएंगे...

फिर नीति का उतरा हुआ चेहरा देखकर सौरभ बोला वैसे भी आपको कौन सा पैंट की जेबें चैक करने की आदत है।

ह्म्म.... 
हाँ....

कहते हुए नीति को याद आने लगा कि कई साल पहले इसी तरह से शादी के करीब-करीब साल भर बाद पति के घर आ जाने पर उनको नाश्ता आदि देकर कपड़े धोने की मंशा से उनका सूटकेस खोला कि कल तो यहीं से कल ससुराल के लिए जाएंगे।

वहां मशीन नहीं है यही से कपड़े वगैरह धो लेती हूँ। 
वहाँ तो पहाड़ पर ठंड भी बहुत होगी। 

कपड़े निकालते हुए उसमें दो लिपिस्टिक लैक्मे की क्रीम और कुछ भी प्रसाधन का सामान और कुछ अतंवस्त्रों के डिब्बों को देखा तो उसे लगा कि अरे वाह, मेरे लिए सामान लाए हैं।

वो मन में खुश हो गयी।
फिर खुद से बोली...
चलो, बाद में खुद ही देंगे।

उसने सूटकेस में से धोने वाले  कपडों को निकाला और मशीन में डालकर अपने काम में लग गईं। 

अगले दिन सुबह ही ससुराल के लिए निकलना है पैकिंग भी करनी है बाजार से घर की जरूरत और बाकी कुछ भी खरीदारी करनी है।
काफी व्यस्त थी नीति!
सब्ज़ी वगैरह लेनी है, पड़ोसी मिलेंगे, मिठाई, गुड़ भी लेना है।
पहाड़ पर गुड़ होना जरूरी होता है।
सासु के लिए कुछ गरम ब्लाउज के कपड़े लेने हैं।
अरे कितना काम बचा है अभी तो । 
कल सुबह जल्दी छह बजे की बस से निकलना भी तो है! 

अगले दिन ससुराल में आकर रोजमर्रा की जिंदगी में व्यस्तता के चलते याद नहीं रहा था कि पति के सूटकेस में उसके लिए गिफ्ट और सामान था।

तीसरे दिन तब याद आया जब वहीं कपड़े "अतंवस्त्रों" को जिठानी के धुले कपड़ो की बाल्टी में देखा।
साँसे ज्यादा तेज़ हो गई और सब घूमता हुआ सा लगा....
तब यही वजह थी क्या जब बड़ी जेठानी ने ताकीद की थी जरा इनका ध्यान रखना...
अच्छी बात नहीं की ये, तब नीति को इतना कुछ समझ में नहीं आया था!
आज एक कड़ी जुड़ गई।

फिर किसी तरह से खुद को घसीटते हुए अपने कमरे की ओर बढ़ते हुए सीढियां उतरने लगी।
पीछे से कोई पुकार रहा था नीति, नीति।
अरे सुन क्या हुआ, अचानक कहाँ को जा रही है।
और नीति को जैसे कुछ सुनाई नहीं दिया था। 

तब से आज तक जेब या सूटकेस नहीं देखे थे नीति ने !
शायद अब आदत नहीं रही।

हाँ, भूल ही तो गयी थी! लेकिन 
वाशिंगमशीन के कपड़ों की तरह मन से सब साफ़ नहीं होता है न। 

Wednesday, 29 December 2021

आत्म अभिव्यक्ति

मैं कुछ लिखना चाहती हूँ
किन्तु अभिव्यक्ति नहीं पाती हूँ
मेरा स्वप्न घरोन्दा छोटा था
पर सुन्दर सा ज्यों स्वर्ग समान
टूट गया, अब यादों के हेतु
रेत में रेखाचित्र बनाती हूँ, 
किन्तु अभिव्यक्ति नहीं पाती हूँ! 

यूँ नहीं विचार-शून्य मन हो
शान्त हृदय का प्रांगण हो
अनवरत प्रश्नों की महानदी में
तृण-मात्र बहा जाती हूँ
किन्तु अभिव्यक्ति नहीं पाती हूँ! 

सुनहली चाँदनी की स्याही से
आकाश पटल के कागज़ पर
कल्पना की कूची ले कर
कुछ चित्रित किया चाहती हूँ
किन्तु अभिव्यक्ति नहीं पाती हूँ! 

हे विधा! कैसा तुमने खेल किया
जीवन का ऐसा अजब आलेख किया
जीवन के इस कठिन मोड़ पर
तुमसे कई प्रश्न किया चाहती हूँ
किन्तु अभिव्यक्ति नहीं पाती हूँ! 

संध्या निशि सिंगार कर रही
है तिमिर साम्राज्य छाने को
इसी तम को मैं मान मित्रवत
हृदय की बात किया चाहती हूँ
किन्तु अभिव्यक्ति नहीं पाती हूँ! 

उतने मीठे गीत हैं होते
जितनी होती उन में पीड़ा
हृदय-भर अपनी इस पीड़ा से
एक गीत रचा चाहती हूँ
किन्तु अभिव्यक्ति नहीं पाती हूँ! 

जिव्हा जब उसे कह नहीं पाती
तब पीड़ा आँखों में भर आती है
अश्रु-बूंदें बहुत कुछ कह जाती हैं
जाने कब से नीर बहाती हूँ
किन्तु अभिव्यक्ति नहीं पाती हूँ! 

वेदना की क्या अभिव्यक्ति?
अश्रु समझ तुम सके नहीं
आँसूओं को ढाल शब्दों में
इन्हें मुखर करना चाहती हूँ
किन्तु अभिव्यक्ति नहीं पाती हूँ!

Saturday, 11 December 2021

छुअन

तुम्हारे हाथों की छुअन... :)

अपने फ़लक के चांद को
कुछ सोचते हुए मैंने
खींच कर छुटाया
और थोड़ा दायीं ओर करके
फिर चिपका दिया
हाँ, अब सप्तर्षि ठीक से दिखता है
पर ऊपर की तरफ़ वो चार सितारे
अभी भी कुछ जँच नहीं रहे
ह्म्म
चलो इन्हें थोड़ा छितरा देती हूँ
लेकिन इससे जगह कम हो जाएगी
थे ः9धऔर हाँ, नीचे की ओर ये कई तारे
कुछ अधिक ही सीध में नहीं लग रहे ?

मैं इसी उधेड़-बुन में थी
अपने घर के आकाश को
सजाने की धुन में थी
कि तभी तुम आये
मेरे चेहरे पर छाई
दुविधा देख
तुम मुस्कुराये
कुछ पल गगन निहारा
फिर अपनी अंजुली में
समेट लिया आकाश सारा
पूरा चांद और हर इक तारा,

मैं चौंक कर अपनी उधेड़-बुन से निकली
मुझे अचरज में देख
तुम खिल-खिलाकर हँस पड़े
और बड़ी चंचलता से तुमने
सारे सितारे फिर से
आकाश में यूं ही बिखेर-से दिए

मेरी हैरत असीम हो गई!
हर सितारा अपनी जगह
तरतीब से टंक गया था
चांद भी अचानक
कुछ अधिक ही
सुंदर लगने लगा
और सारा आकाश
एकदम व्यवस्थित हो गया
फिर तुम करीब आकर
मेरे कांधे पर हाथ रख
बैठ गये!
मैं आश्चर्य की प्रतिमूर्ती बनी
कभी आकाश को, कभी तुम्हें
कभी तुम्हारे सुंदर हाथों को
देखती ही रह गयी

कुछ तो हुनर है
तुम्हारे हाथों की छुअन में
कि हर चीज़ सज जाती है
सलीके से
चाहे वो ज़िन्दगी हो या आकाश !
"तनु"

Wednesday, 1 December 2021

Deep in to eyes

दिल चाहता है 

"When Tara comes to Sid's place to look at the paintings made by Sid, she just gazes very deeply at each painting and says, "Isme bhi vahi baat". Sid is curious to know what she means and what she's found in his paintings. So when Sid asks her, she explains: 

"आज मैंने तुम्हारे बारे में एक बात जानी है। कहने को तुम लोगों से हँसते हो, बोलेतेे हो l लेकिन तुम्हारे अंदर जो दुनिया है , तुम्हारे ख़्वाब , तुम्हारे सपने, वो तुम किसी से नही बाटते। मुझे तो लगता है जो लोग तुम्हें जानते है, वो भी तुम्हें ठीक से नहीं जानते ।"

( Today I learned something about you. Even though you interact and laugh with people, there's a world inside you that you don't share with them. In fact I feel that even the people who claim to know you, don't really know you). 

And I was just stunned at these lines..these lines were exactly written for the thousands of people in whom deep inside, there is someone like Siddharth. How often do we want to share or tell something to someone but we just don't, not because we don't have anyone, but the reason is just that we can't. It's just within you. I was just wonderstruck by this scene, it's like Tara said these lines to me. This scene made me realise that there is someone who knows exactly what I feel, I realised that someone is there who knows me. It's not just that she knew what's inside me, but she knew what even I didn't know about me. 

I rewind this scene again and again just to listen to Tara's dialogues..
it's so profound and calming to me. Thanks Tara for making me believe that a stranger too can understand us. Thanks Tara for reaffirming my faith in the kindness of strangers. Thanks Tara for introducing me to myself. Thanks Tara for the kind words!!"

Tuesday, 30 November 2021

मन का सूर्य ☀

सुबह हो गई है /
प्रमाण हैं इसके,
पेड़, पौधे, रेत  टीले  पहाड़ 
सब दृष्टिगत हो रहे हैं,
रास्ते भी स्पष्ट हो गए हैं! 
स्त्रियां द्वारे बुहार रही हैं /
शुभता चारों और फैली है,
और इस शुभता पर, 
हल्की सी धुंध ने डेरा डाल रखा है /
इस काली रात को, 
सुबह बनाने वाले,
तुम अब भी नहीं दिखे कभी,
खुली आँखों से, 
इस सुबह की ये सबसे बुरी बात है...
कि चाहिए एक लालिमा, 
इस कालिमा पर, 
प्रमाण को परिमाण की आवश्यकता है 
सुबह को सूर्य की आवश्यकता है
                   " तनु " 1/12/2015